अण्णा जी, आप पेड़ पर चढ़ तो गये हैं, लेकिन अब उतरेंगे कैसे?
by Suresh Chiplunkar on Friday, August 19, 2011 at 1:11pm
जस्टिस संतोष हेगडे जी ने कहा है कि यदि सरकार को न्यायपालिका और प्रधानमंत्री को जनलोकपाल के दायरे में रखने पर आपत्ति है तो उस पर पुनर्विचार किया जा सकता है… मैं अपने साथियों से इस बारे में बात करूंगा, यानी "समझौते" की की ओर पहला कदम बढ़ गया है। अण्णा जी भी फ़िलहाल 15 दिनों के अनशन पर राजी हो गये हैं, और उन्होंने यह भी कहा है कि इस अवधि को बढ़ाया भी जा सकता है… अर्थात "समझौता वार्ता" किस प्रकार आगे बढ़ती है और इसका सम्मानजनक समझौता (यानी कांग्रेस और अण्णा) कैसा और कब होगा, यह अगले 10-15 दिनों में तय होगा… मैं जानने को उत्सुक हूँ कि अमेरिका से सोनिया गाँधी के लौटने में कितने दिन बचे हैं?
इस बीच टीम अण्णा ने पूरे देश में मीडिया मैनेजमेण्ट के जरिये ऐसा माहौल खड़ा कर दिया है कि अब अण्णा "बेकाबू शेर" के ऊपर सवार हो गए हैं। एक व्यक्तिगत सर्वे में मैंने पाया कि गरीब व्यक्ति सोच रहा है कि अण्णा महंगाई कम कर देंगे, पास की दुकान में काम करने वाला कहता है कि जनलोकपाल बिल से स्कूल में डोनेशन नहीं देना पड़ेगा, हमारी काम वाली बाई कह रही है कि अण्णा के आंदोलन से सड़कें बनेंगी और नालियाँ साफ़ होंगी…यानी किसी को असल में पता नहीं है कि "जनलोकपाल" क्या है। इस प्रकार का "भीड़तंत्रवाद" (मास हिस्टीरिया) पैदा करना तो आसान है, लेकिन बाद में उसे संभालना मुश्किल हो जाता है…।
जिस बात की तरफ़ मैं पहले दिन से इशारा कर रहा हूँ, कि कहीं यह आंदोलन आम जनता के बीच "निराशावाद" की लहर न पैदा कर दे, हालात इसी तरफ़ बढ़ रहे हैं। टीम अण्णा की "बुद्धिमान" टीम ने अण्णा को ताड़ के पेड़ पर चढ़ा तो दिया है, लेकिन कहीं ऐसा न हो कि अण्णा को उतरने का रास्ता न मिले। इस ऊँचाई से नीचे उतरते समय "कांग्रेसी सीढ़ी" का सहारा लिया तब भी उनके लिए मुश्किल खड़ी होगी… परन्तु जन-भावनाओं का जो "ज्वार" खड़ा किया गया है उस पर "सर्फ़िंग" करते समय बेहद सावधानी बरतनी होगी, क्योंकि ज्वार को कभी न कभी तो उतरना ही है, इसी प्रकार अण्णा को भी कभी न कभी ताड़ के पेड़ से तो उतरना ही है। इस प्रक्रिया में जनता के साथ "चोट" होने की पूरी सम्भावना है, क्योंकि आम लोग तथा कम-पढ़ा लिखा वर्ग अब इस "मुगालते" में आ गए हैं कि अण्णा उसके लिए "जादू की छड़ी" लाए हैं, जिसे घुमाने पर उसे 20 रुपए किलो दाल मिलने लगेगी, उसके घर के सामने की सड़क चकाचक हो जाएगी, या भ्रष्ट नेता-कलेक्टर को फ़ाँसी हो जाएगी…
मूल सवाल वही है, जो आंदोलन के पहले दिन से ही था… कि अण्णा जी, आप पेड़ पर चढ़ तो गये हैं (बल्कि जबरन चढ़ा दिये गये हो), लेकिन अब उतरेंगे कैसे?
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